ख़ामोश इश्क़
वो हर रोज़ वहाँ से गुज़रती और मैं दूर खड़े उसे देखता रहता । वैसे तो हर रोज़ वो कमाल लगती थी पर उस दिन सफ़ेद सलवार क़मीज़ में तो बस क़यामत ही ढा रही थी। मैं तो उसे देखता ही रह गया । कुछ पल के लिए तो मुझे लगा वक़्त जैसे थम गया हो और मैं उजले चेहरे पर उड़ती हुई ज़ुल्फ़ों को अपनी ऑंखों में क़ैद कर रहा हूँ । ख़ैर जल्द ही मेरा भर्म टूटा और उसकी बस आगे चल दी। पता नहीं वो कौन थी। ना मैं उसका नाम जनता था ना पता, अरे मैं तो ये भी नहीं जनता था कि वो हर रोज़ १२ नम्बर की बस से सुबह १० बजे जाती कहाँ थी। शायद कालेज जाती हो या कही नौकरी करती हो क्योंकि हर रोज़ उसके साथ ३-४ सहेलियाँ हुआ करती थी। ख़ैर जो भी हो मैं तो बस इतना जानता था कि वो बेहद ख़ूबसूरत थी। जिस दिन उसको ना देखूँ मेरा दिल किसी काम में लगता ही नहीं था। वो एक नशे की तरह थी जब तक वो दिखती नहीं थी बेचैन रहता था और जब वो दिख जाती थी तो फिर अगले दिन का इंतज़ार रहता था। मैं आपको अपने बारे में बता दूँ मेरा नाम राहुल है। बात उन दिनों कि है जब मैं कालेज में पढ़ा करता था। मैं बस स्टाप पर अपनी कालेज की बस का इंतज़ार कर रहा जब उसकी बस व...