दर्पण
आज बहुत समय बाद मैंने फ़ुर्सत में ख़ुद को दर्पण में निहारा। ख़ुद को देख कर आज बहुत अचरज हुआ क्या मैं वही दीप्ति हु। बिखेर बाल ,आँखों के नीचे काले घेरे। वक़्त से पहले चेहरे पे झूरियो ने अपना बसेरा कर लिया था और मेरा पेट तो जैसे फ़ुट्बॉल हो गया हो। मन ना चाहते हुए भी बीते सालों की ओर दौड़ चला । आज भी याद है मुझे जब मैंने मिस जयपुर का ख़िताब जीता था उसने धीरे से मेरे पास आकर मुझे congratulate किया था। वो रोज़ मेरा पीछा करता मैं रोज़ अपने दोस्तों के साथ मिलकर उसका मज़ाक़ उड़ाती। मेरे लिए तो वो मेरा एक आशिक़ था बाक़ियों की तरह। धीरे धीरे वक़्त बीता मेरी शादी हुई , भगवान ने मुझे दो प्यारी बेटियों की माँ बनने का सुख दिया। वैसे तो मेरे पति अच्छा ख़ासा कमा लेते है पर जैसे जैसे बेटियाँ बड़ी हुई उनकी पढ़ाई के खर्चें बहुत बढ़ गए। घर में पैसों की तंगी के चलते मैंने नौकरी करने का फ़ैसल लिया । आज मुझे नौकरी करते हुए १ साल हो गया है । आज हमारे ऑफ़िस के वार्षिक महोत्सव में वो मुझे एक बार फिर मिला वो हमारे ऑफ़िस के कार्यक्रम में चीफ़ गेस्ट बन कर आया था। जिसका मैं अपना एक आवारा आशिक़ समझ क...