कोठेवाली

आओ हुज़ूर तुमको सितारों में ले चलू....हा हा हा....ए लड़की तेरा नाम क्या है मेरे ग्राहक ने मुस्कुराते हुए पूछा।

क्यों साब शादी मनाएगा क्या मुझसे नाम जान कर क्या करेगा जो करना है कर और चलता बन। अरे फिर भी बता तो उसने दोबारा पूछा।  सकीना मैंने उत्तर दिया । ओहो गदर की सकीना चल आजा कहते हुए वो मेरे ऊपर लेट गया।

ये नाम मेरे मां बाप ने नहीं दिया मुझे तो पता भी नहीं मेरे मां बाप कौन है। जबसे होश संभाला बेगम अम्मी को ही देख रही हूं। उनको गदर फिल्म वही सनी देओल वाली बहुत पसंद है उसमें हीरोइन का नाम सकीना था ना तो बस उन्होंने मेरा नाम भी सकीना रख दिया। बचपन में जब में बेगम अम्मी के कोठे पर औरतों को तैयार खड़ी देखती तो मेरा भी मन करता खूब सजू धजू उनकी तरह। मुझे इतना पता था ये तैयार होती है तो इनको पैसे मिलते हैं। मुझे लगता था ये काम कितना अच्छा है । फिर जब एक दिन मुझे भी इस काम में लगा दिया तब समझ आया कि मेहनत की कमाई है खाली सजने संवरने की नहीं।

तुम लोगो को क्या लगता है कोठेवाली की ज़िन्दगी मजे की होती है। रोज़ रोज़ नए नए नमूनों को झेलो। तरह तरह के किरदारों के साथ अलग अलग किरदार निभाओ। कोई मेरे पास सिर्फ सेक्स के लिए आता हैं तो कोई अपनी समस्याओं का हल खोजने। पहले तरीके के ग्राहक को झेलना आसान होता है। पर दूसरी तरीके के ग्राहक का कसम से झेले नहीं जाते। यहां मेरा खुद की ज़िन्दगी पर कोई काबू नहीं मेरी अपनी ज़िन्दगी मेरी नहीं दल्ले और बेगम अम्मी की है और ये लोग मुझमें अपनी समस्याओं का हल खोजते थे। अजीब बात है ना ये।


कल मेरे पास ऐसा ही एक ग्राहक आया था । उसकी बीवी ने उससे बेवफाई की। उसके किसी दोस्त के साथ चक्कर था उसका और वो मेरे साथ उसकी बेवफा बीवी का बदला लेने आया था। कितनी अजीब बात है हम खफा किसी से होते हैं और सज़ा किसी और को देते है। जैसे दफ्तर में साहब का गुस्सा अक्सर बीवी बच्चो या चपरासी पे ही निकलता है। या फिर कभी गर्लफ्रेंड से शादी ना हो पाने से अपनी किस्मत का गुस्सा उस नई नवेली मासूम दुल्हन पे निकलता है जिसे इस मसले से कोई सरोकार तक नहीं है। 


कभी कभी मेरे पास एक 20 साल का लड़का भी आता था। इंजीनियरिंग कर रहा था पेपर निकलते नहीं थे बैक आ जाती थी घरवालों से डांट खाकर मेरे पास आता था। शायद पेपर में हुई हार को जीते बदलने। 20 साल की उम्र में उससे पढ़ाई का प्रेशर नहीं झेला जा रहा था यहां मैं कितना कुछ झेल कर आज भी मुस्कुराती हूं। 


कभी कभी मेरे पास फिल्म वाले भी आते थे जो मुझ पर फिल्म बनाना चाहते थे। अजीब बात है मैं तो साला कुबेर का खज़ाना हो गई रोज़ दल्ले और बेगम अम्मी मेरी जवानी बेच हजारों कमाते थे अब ये फिल्म वाले मेरी कहानी बेच लाखो करोड़ों कमाएंगे। फिर भी मैं गरीब की गरीब ही रहूंगी।

कभी कभी ज़िन्दगी से नाराज़ लोग मेरे पास आते मुझे मारते सिगरेट से जलाते। मैं सब सेह लेती कम से कम मेरे कोठे से जाने के बाद वो एक बेहतर इंसान की तरह तो रहेंगे। किसी और को अपने गुस्से का शिकार तो नहीं बनाएंगे।

ऐसे कई किरदार मेरे पास आया करते हैं। उनको देख कर मुझे लगता है मैं कितनी महान हू इनसे कहीं गुना अधिक सहनशक्ति है। मैं तो हर रोज़ बिस्तर पर कुचली जाती हूं। हर रोज़ नया किरदार निभाती हू हर रोज़ कितनी जिल्लत झेलती हूं कितनी बार अपने दिल की आवाज़ को अनसुना करती हूं पर इनकी तरह मै किसी का सहारा लेने नहीं जाती।
बल्कि लोगो को सहारा देती हूं।

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