ek masoom prem kahani aur ek pita ka guroor
यो तो ये शहर मेरे लिये अनजान ना था पर हाल ही में मेरी नज़र शहर के बीचों-बीच खडी एक खंडहर सी इमारत पर जा टिकी। जिस जगह वो इमारत थी उसकी कीमत 5-6 करोड से कम तो नहीं होगी। आस पास इतना डेवलपमेंट फिर इस इमारत का नवीनीकरण क्यों नही किया गया ये बात मुझे खटकी।
पास में एक चाय की गुमटी थी मैने चाय वाले से अपनी इस उलझन का जिक्र किया। चाय वाले ने मुझे बताया मैडम कहते हैं बहुत साल पहले इस इमारत से 2 प्यार करने वालों ने कूद कर जान दे दी थी। तब से लोग कहते है यहाँ दोनों की रूह भटकती है।
रूह भटकती है हा-हा-हा ये सुनकर मेरी हंसी नहीं रुक रही थी। पर चाय वाला ये बात बोले तो समझ आती है पर नगर निगम वाले तथा अन्य बिल्डर्स कैसे इस बात को मान गये ये थोडा विस्मय मे डालने वाली बात थी। इसलिए मैंने चाय वाले से उत्सुकतावश पूछा भईया हुआ क्या था ज़रा विस्तार से बताईये ना। चाय वाले के आँख में चमक आ गई बोला मैडम कहानी ज़रा लंबी है आप यहाँ बैठ जाओ मै आपको गरमा गरम पकोड़े और चाय देता हूँ जब तक आप चाय पकोड़े खाओगी कहानी भी खत्म हो जाएगी।
पकोड़े खाने की ना तो मेरी इच्छा थी ना ही भूख पर कहानी सुनने के लालच में मै बैठ गई। चाय वाले ने बडे रहस्यमय अंदाज से बताना शुरू किया ये जो आप खंडहर सी इमारत देख रही है मैडम एक ज़माने मे शहर की जान हुआ करती थी बड़े-बड़े रसूखदारों के घर थे इसमें । इस बेजान सी इमारत ने ना जाने कितने उत्सव देखे हैं। ये अपने ज़माने की हाई प्रोफाइल पार्टीस को लेकर सदैव चर्चा मे रहती थी। एक दिन फिर से ये इमारत चर्चा में आई पर इस बार ये आखिरी बार था इसी इमारत ने दो प्रेमियों की जान ली है।
वो इस इमारत की पांचवीं मंजिल के घर मे रहा करती थी। वकील साहब की तीसरे नंबर की और सबसे छोटी संतान थी नेहा । उससे बड़े 2 बेटे थे वकील साहब को। नेहा, जैसा नाम वैसा रूप बड़ी-बड़ी आँखे बहुत ही सुन्दर थी वो। उसके दीवानों की गिनती की जाना मुश्किल थी। वो जहाँ से निकल जाये संनाटा छा जाता था हर कोई अपना काम छोड़ उसे ही देखने मे लग जाता था। पर मज़ाल थी किसी की जो नेहा से बात कर ले वकील साहब का इतना रुतबा जो था।
नेहा सुंदर तो थी ही उसके कंठ मे जैसे साक्षात माता सरस्वती का वास था। इसी इमारत की तीसरी मंजिल में एक बच्चे को संगीत सिखाने आता था निश्छल ।
नेहा का कालेज जाने का समय और निश्छल का टयूशन खत्म कर जाने का समय लगभग एक था। दोनों अक्सर लिफ्ट में मिला करते थे। दोनों को संगीत से प्रेम था और दोनों को ही इस विषय मे गहरी जानकारी । कहते हैं जहाँ रूचियाँ एक सी हो तो जान पहचान होने में समय नहीं लगता। ये दो राग कब एक धुन बन गये शायद ये वो दोनों भी नहीं समझ पाये।
इन दोनों के इश्क की खबर नेहा के आशिकों के लिए ज़हर से कम न थी। ये आशिकों की फ़ितरत भी गज़ब होती है भले ही खुद कभी लकड़ी से बात करने की हिम्मत न की हो पर ये जानते ही कि वो किसी और की हो गई है उनसे चुप नहीं रहा जाता। फिर नेहा ने तो प्रेम किया था अगर घरवालों की मर्जी से शादी की होती तो भी वो लोग झेल जाते। ऐसे ही किसी आशिक ने दोनो के प्रेम की खबर वकील साहब को दे दी।
वकील साहब के लिए ये रिशता नागवार था कारन निश्छल की जाति अलग थी। उन्होंने नेहा को निश्छल को छोडने का फरमान सुना डाला और उसके लिए वर तलाशने लगे। मगर नेहा एक आदर्श लडकी थी उसके लिये प्रेम कोई भोग वस्तु नहीं बल्कि पावन बंधन था। उसका मानना था जिसको प्यार किया जिससे प्यार के वादे किए शादी भी उसी से करेगी। उसने वकील साहब को समझाने और मनाने की बहुत कोशिश की पर वे न माने। आखिरकार नेहा ने परिवार और प्यार मे से प्यार को चुनने का फैसला लिया। वो वकील साहब का घर छोड़ कर निश्छल के साथ चली गई दोनों ने मंदिर में शादी कर ली और साथ रहने लगा।
वकील साहब बड़े रसूख वाले आदमी थे उनके लिए बेटी की खुशी से बढ़कर अपनी इज्जत और शान थी। आज सारा शहर उन पर हंस रहा था और ये उनको गंवारा ना था। 2 हफ्ते हो गये आज परन्तु बेटी के घर छोडने के बाद से वकील साहब अब तक अपने कमरे से ना निकले थे। बहुत गहरा सदमा लगा था उन्हे। 16वें दिन जब वे अपने कमरे से बाहर आये तो बेहद खुश नज़र आ रहे थे जैसे कुछ हुआ ही नहीं । उन्होंने अपनी धर्मपत्नी से कहा मुझे तुम सबसे कुछ जरूरी बात करनी है सबसे कहो नाश्ते के वक़्त मुझसे मिले। पिता के आदेशानुसार पूरा परिवार नाश्ते की मेज पर इकट्ठा हुआ। सबके दिल ज़ोरो से धड़क रहे थे और सबसे तेज वकील साहब की पत्नी का ना जाने वकील साहब क्या कहने जा रहे हैं । आखिरकार वकील साहब ने चुप्पी तोडते हुए कहा नेहा ने जो किया वो अच्छा नहीं किया मै उसकी इस हरकत से बहुत आहात हुआ हूँ। पर अब जब उसने शादी कर ही ली है और सारे शहर को भी इसकी भनक है तो मैं चाहता हूँ उसकी विधि विधान से पूरे धूम-धाम से शादी कर दी जाए। ऐसा करने से शहर में मेरी इज्जत भी बढेगी इसे हम ऐसे प्रोजेक्ट करेगे की वकील साहब बहुत ही धर्म निरपेक्ष हैं वे जात-पात को नही मानते । उन्होंने अपनी धर्मपत्नी से कहा तुम नेहा और निश्छल को कल दोपहर खाने पर बुला लो ताकी शादी की बात की जा सके।
उनकी पत्नी इस बात से थोडी खफा जरूर थी कि बेटी की शादी में भी इन्हे स्वार्थ सिद्धि सूझ रही है पर वकील साहब द्वारा बेटी को अपना लेने की खुशी ने सब गिले-शिकवे दूर कर दिए थे। उन्होंने ये खुशखबरी बेटी को दी। अगले दिन नेहा और निश्छल तय समय पर घर पहुंचे दोनो बहुत ही खुश थे । खाना खाने के बाद वकील साहब ने दोनों से कहा तुम दोनों ने मेरा बहुत दिल दुखाया है बावजूद इसके मैंने तुम दोनों को स्वीकार किया है परंतु एक बात है जो मैं तुम दोनों से अकेले में करना चाहता हूँ अतः तुम दोनों मेरे साथ छत पर चलो। तीनों इमारत की छत जो कि 8वीं मंजिल पर थी पहुंचे । वहाँ जाकर वकील साहब ने गंभीर मुद्रा में दोनो से कहा तुम दोनों ने मेरी इतने सालों से कमाई इज्जत मिट्टी में मिला दी तुम्हे क्या लगा मैं इतनी आसानी से तुम लोगों को माफ कर दूंगा इससे पहले दोनों कुछ समझ पाते वकील साहब ने दोनों को छत से धक्का दे दिया।
चीख़ों की आवाज़ सुन घरवाले बाहर की ओर दौड़े सामने से वकील साहब आ रहे थे उनके चहेरे पर परम शांति का भाव था। घरवाले पूछ रहे थे क्या हुआ वे किसी को कोई उत्तर नहीं दे रहे थे । कुछ ही पल में पुलिस वहाँ पहुँच गई। वकील साहब पुलिस को देखते हुए बोले मैंने ही आप लोगों को खबर करवाई थी मै आभी-अभी अपने बेटी-दामाद का कत्ल करके आ रहा हूँ और आपके सामने आत्मसमर्पण कर रहा हूँ ।
बस तभी से मैडम जी कहते हैं नेहा और निश्छल की रूहें यहाँ घूमती है । चाय वाले ने कहानी खत्म करते हुए कहा 30 रूपये हुए मैडम जी । मै 30 रूपये उसे देकर वहाँ से घर की ओर चल दी। रास्ते भर मैं सोचती रही रुह वाली बात का पता तो नही पर ऑनर किलिंग करके वकील साहब को क्या मिला 2 मासूमो की जान गई खुद भी जेल गये। बेवजह 2 परिवार (नेहा और निश्छल के परिवार) बिखरे वो अलग।
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पास में एक चाय की गुमटी थी मैने चाय वाले से अपनी इस उलझन का जिक्र किया। चाय वाले ने मुझे बताया मैडम कहते हैं बहुत साल पहले इस इमारत से 2 प्यार करने वालों ने कूद कर जान दे दी थी। तब से लोग कहते है यहाँ दोनों की रूह भटकती है।
रूह भटकती है हा-हा-हा ये सुनकर मेरी हंसी नहीं रुक रही थी। पर चाय वाला ये बात बोले तो समझ आती है पर नगर निगम वाले तथा अन्य बिल्डर्स कैसे इस बात को मान गये ये थोडा विस्मय मे डालने वाली बात थी। इसलिए मैंने चाय वाले से उत्सुकतावश पूछा भईया हुआ क्या था ज़रा विस्तार से बताईये ना। चाय वाले के आँख में चमक आ गई बोला मैडम कहानी ज़रा लंबी है आप यहाँ बैठ जाओ मै आपको गरमा गरम पकोड़े और चाय देता हूँ जब तक आप चाय पकोड़े खाओगी कहानी भी खत्म हो जाएगी।
पकोड़े खाने की ना तो मेरी इच्छा थी ना ही भूख पर कहानी सुनने के लालच में मै बैठ गई। चाय वाले ने बडे रहस्यमय अंदाज से बताना शुरू किया ये जो आप खंडहर सी इमारत देख रही है मैडम एक ज़माने मे शहर की जान हुआ करती थी बड़े-बड़े रसूखदारों के घर थे इसमें । इस बेजान सी इमारत ने ना जाने कितने उत्सव देखे हैं। ये अपने ज़माने की हाई प्रोफाइल पार्टीस को लेकर सदैव चर्चा मे रहती थी। एक दिन फिर से ये इमारत चर्चा में आई पर इस बार ये आखिरी बार था इसी इमारत ने दो प्रेमियों की जान ली है।
वो इस इमारत की पांचवीं मंजिल के घर मे रहा करती थी। वकील साहब की तीसरे नंबर की और सबसे छोटी संतान थी नेहा । उससे बड़े 2 बेटे थे वकील साहब को। नेहा, जैसा नाम वैसा रूप बड़ी-बड़ी आँखे बहुत ही सुन्दर थी वो। उसके दीवानों की गिनती की जाना मुश्किल थी। वो जहाँ से निकल जाये संनाटा छा जाता था हर कोई अपना काम छोड़ उसे ही देखने मे लग जाता था। पर मज़ाल थी किसी की जो नेहा से बात कर ले वकील साहब का इतना रुतबा जो था।
नेहा सुंदर तो थी ही उसके कंठ मे जैसे साक्षात माता सरस्वती का वास था। इसी इमारत की तीसरी मंजिल में एक बच्चे को संगीत सिखाने आता था निश्छल ।
नेहा का कालेज जाने का समय और निश्छल का टयूशन खत्म कर जाने का समय लगभग एक था। दोनों अक्सर लिफ्ट में मिला करते थे। दोनों को संगीत से प्रेम था और दोनों को ही इस विषय मे गहरी जानकारी । कहते हैं जहाँ रूचियाँ एक सी हो तो जान पहचान होने में समय नहीं लगता। ये दो राग कब एक धुन बन गये शायद ये वो दोनों भी नहीं समझ पाये।
इन दोनों के इश्क की खबर नेहा के आशिकों के लिए ज़हर से कम न थी। ये आशिकों की फ़ितरत भी गज़ब होती है भले ही खुद कभी लकड़ी से बात करने की हिम्मत न की हो पर ये जानते ही कि वो किसी और की हो गई है उनसे चुप नहीं रहा जाता। फिर नेहा ने तो प्रेम किया था अगर घरवालों की मर्जी से शादी की होती तो भी वो लोग झेल जाते। ऐसे ही किसी आशिक ने दोनो के प्रेम की खबर वकील साहब को दे दी।
वकील साहब के लिए ये रिशता नागवार था कारन निश्छल की जाति अलग थी। उन्होंने नेहा को निश्छल को छोडने का फरमान सुना डाला और उसके लिए वर तलाशने लगे। मगर नेहा एक आदर्श लडकी थी उसके लिये प्रेम कोई भोग वस्तु नहीं बल्कि पावन बंधन था। उसका मानना था जिसको प्यार किया जिससे प्यार के वादे किए शादी भी उसी से करेगी। उसने वकील साहब को समझाने और मनाने की बहुत कोशिश की पर वे न माने। आखिरकार नेहा ने परिवार और प्यार मे से प्यार को चुनने का फैसला लिया। वो वकील साहब का घर छोड़ कर निश्छल के साथ चली गई दोनों ने मंदिर में शादी कर ली और साथ रहने लगा।
वकील साहब बड़े रसूख वाले आदमी थे उनके लिए बेटी की खुशी से बढ़कर अपनी इज्जत और शान थी। आज सारा शहर उन पर हंस रहा था और ये उनको गंवारा ना था। 2 हफ्ते हो गये आज परन्तु बेटी के घर छोडने के बाद से वकील साहब अब तक अपने कमरे से ना निकले थे। बहुत गहरा सदमा लगा था उन्हे। 16वें दिन जब वे अपने कमरे से बाहर आये तो बेहद खुश नज़र आ रहे थे जैसे कुछ हुआ ही नहीं । उन्होंने अपनी धर्मपत्नी से कहा मुझे तुम सबसे कुछ जरूरी बात करनी है सबसे कहो नाश्ते के वक़्त मुझसे मिले। पिता के आदेशानुसार पूरा परिवार नाश्ते की मेज पर इकट्ठा हुआ। सबके दिल ज़ोरो से धड़क रहे थे और सबसे तेज वकील साहब की पत्नी का ना जाने वकील साहब क्या कहने जा रहे हैं । आखिरकार वकील साहब ने चुप्पी तोडते हुए कहा नेहा ने जो किया वो अच्छा नहीं किया मै उसकी इस हरकत से बहुत आहात हुआ हूँ। पर अब जब उसने शादी कर ही ली है और सारे शहर को भी इसकी भनक है तो मैं चाहता हूँ उसकी विधि विधान से पूरे धूम-धाम से शादी कर दी जाए। ऐसा करने से शहर में मेरी इज्जत भी बढेगी इसे हम ऐसे प्रोजेक्ट करेगे की वकील साहब बहुत ही धर्म निरपेक्ष हैं वे जात-पात को नही मानते । उन्होंने अपनी धर्मपत्नी से कहा तुम नेहा और निश्छल को कल दोपहर खाने पर बुला लो ताकी शादी की बात की जा सके।
उनकी पत्नी इस बात से थोडी खफा जरूर थी कि बेटी की शादी में भी इन्हे स्वार्थ सिद्धि सूझ रही है पर वकील साहब द्वारा बेटी को अपना लेने की खुशी ने सब गिले-शिकवे दूर कर दिए थे। उन्होंने ये खुशखबरी बेटी को दी। अगले दिन नेहा और निश्छल तय समय पर घर पहुंचे दोनो बहुत ही खुश थे । खाना खाने के बाद वकील साहब ने दोनों से कहा तुम दोनों ने मेरा बहुत दिल दुखाया है बावजूद इसके मैंने तुम दोनों को स्वीकार किया है परंतु एक बात है जो मैं तुम दोनों से अकेले में करना चाहता हूँ अतः तुम दोनों मेरे साथ छत पर चलो। तीनों इमारत की छत जो कि 8वीं मंजिल पर थी पहुंचे । वहाँ जाकर वकील साहब ने गंभीर मुद्रा में दोनो से कहा तुम दोनों ने मेरी इतने सालों से कमाई इज्जत मिट्टी में मिला दी तुम्हे क्या लगा मैं इतनी आसानी से तुम लोगों को माफ कर दूंगा इससे पहले दोनों कुछ समझ पाते वकील साहब ने दोनों को छत से धक्का दे दिया।
चीख़ों की आवाज़ सुन घरवाले बाहर की ओर दौड़े सामने से वकील साहब आ रहे थे उनके चहेरे पर परम शांति का भाव था। घरवाले पूछ रहे थे क्या हुआ वे किसी को कोई उत्तर नहीं दे रहे थे । कुछ ही पल में पुलिस वहाँ पहुँच गई। वकील साहब पुलिस को देखते हुए बोले मैंने ही आप लोगों को खबर करवाई थी मै आभी-अभी अपने बेटी-दामाद का कत्ल करके आ रहा हूँ और आपके सामने आत्मसमर्पण कर रहा हूँ ।
बस तभी से मैडम जी कहते हैं नेहा और निश्छल की रूहें यहाँ घूमती है । चाय वाले ने कहानी खत्म करते हुए कहा 30 रूपये हुए मैडम जी । मै 30 रूपये उसे देकर वहाँ से घर की ओर चल दी। रास्ते भर मैं सोचती रही रुह वाली बात का पता तो नही पर ऑनर किलिंग करके वकील साहब को क्या मिला 2 मासूमो की जान गई खुद भी जेल गये। बेवजह 2 परिवार (नेहा और निश्छल के परिवार) बिखरे वो अलग।
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