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Showing posts from November, 2019

इतिहास जब वर्तमान बन जाए

"आपकी बेटी की हालत बेहद गंभीर है,उसका तुरंत ऑपरेशन करना होगा। आप ज़रूरी फॉर्मेलिटी पूरी दीजिए।" कह कर डॉक्टर चला गया संकेत के पांव तले जैसे ज़मीन ही खिसक गई थी। जिस नन्ही सी गुड़िया को इतने नाज़ों से पाला आज वो ज़िंदगी और मौत के बीच जूझ रही थी। संकेत भारी मन से रिसेप्शन पर गया जरूरी फार्म भरे पैसे जमा कराए। वो जो जो कहता गया संकेत वो सब करता गया उसकी कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या सही क्या गलत।  उसका दिमाग तो एक ही उलझन में उलझा हुआ था उसकी गुड़िया ठीक तो हो जाएगी ना बच तो जाएगी ना। उस समय अगर कोई कहता तुम सारी प्रॉपर्टी मेरे नाम करदो मैं तुम्हारी बेटी को ठीक कर दूंगा तो शायद संकेत वो भी कर देता। जल्दी जल्दी वो सारी फॉर्मेलिटी पूरी कर वापस आया उसकी पत्नी लता का तो रो रो कर बुरा हाल हो रहा था। डॉक्टर ने स्नेहा को ऑपरेशन थियेटर में शिफ्ट किया और ऑपरेशन चालू हो गया। तभी कुसुम वहां भागी भागी अाई स्नेहा कैसी है अब? उसने पूछा। कुसुम को देख लता से रहा ना गया और लाल आंखे किए उससे बोली " क्यों अाई हो तुम यहां? तुम्हारे बेटे ने देखो क्या हाल कर दिया है मेरी फूल सी बेटी का। क्...

हां खूबसूरत हो तुम

हां खूबसूरत हो तुम कहो ये बार बार खुद से कहो ये खुद से चेहरा रंग कद काठी सब दिखावा है ऊपर वाले ने तुम्हे निराला बनाया है कहो ये तब तलक खुद से जब तलक तुम्हारा आइना तुम्हे अपना ना ले हां खूबसूरत हो तुम कहो ये बार बार खुद से। हां खूबसूरत हो तुम कहो ये बार बार खुद से कहो ये खुद से तो क्या हुआ जो बाल कम हो गए तो क्या हुआ जो कुछ मोटे हम हो गए तो क्या हुआ जो रंग काला है तो क्या हुआ जो किसी ने एसिड दे मारा है तो क्या हुआ जो किसी बीमारी का साया है कहो ये तब तलक खुद से जब तलक तुम्हें खुद से प्यार ना हो जाए हां खूबसूरत हो तुम कहो ये बार बार खुद से। हां खूबसूरत हो तुम कहो ये बार बार खुद से कहो ये उन सब से जो रंग रूप को लेकर तुम्हे नीचा दिखाते है कहो ये तब तलक उन सब से जब तक वो खुद की सोच पर शर्मिंदा ना हो जाएं हां खूबसूरत हो तुम कहो ये बार बार खुद से - संचिता सक्सेना " दर्शिका" ( स्वरचित)

अंतिम विदाई

सुबह के 4 बजे थे मीना आज रोज़ से थोडा जल्दी उठ गई थी कारण आज पीने का पानी आना था। उसके मौहले में पीने वाला पानी हफ्ते में 3 दिन ही आता था। मीना जल्दी-जल्दी बाल्टी ले कर नल की तरफ  बढ़ी। आज तो पहला नंबर मेरा ही होगा सोचती हुई जब नल पर पहुँची तो देखा उसके आगे 6 नंबर थे। "कमबख़्त जाने कितनी भोर से यहाँ आ जाते हैं, रात में सोते भी हैं या नहीं" मन ही मन बडबडाते हुए मीना ने बाल्टी रख अपना 7वाँ नंबर सुरक्षित कर गहरी सांस ली। पिछली बार मीना की आँख देर से खुली तो 25वाँ नंबर लगा था। उसका नंबर आते-आते पानी ही खत्म हो चला था। सिर्फ 3 बरतन पानी मिला था उस दिन और रमेश की बहू से झगड़ा हुआ वह अलग। अभी पानी आने में 2 घंटे शेष थे। मीना ने घर आकर जल्दी-जल्दी खाना बनाया स्नान आदि किया। फिर 6 बजे घर के अन्य सदस्यों (पति और 2 बेटो) को उठाया "उठो पानी आ गया है।" पानी शब्द सुनते ही सब फौरन उठ खड़े हुए।पूरा परिवार पानी भरने के अभियान में जुट गया। किसी ने लाईन मे लग मोरचा संभाला कोई घर के खाली बरतन लेकर दौड़ा तो कोई पानी से भरे बरतनों को घर पर रख कर आया । सभी के सहयोग से आज मीना के घर ...

एडवेंचर से परिपूर्ण हनीमून

निशांत वर्मा जी के 3 बच्चों में से सबसे बड़े था। निशांत बचपन से ही पढ़ने में ठीक-ठाक ही था । यूं तो वर्मा जी सरकारी दफ्तर में क्लर्क थे परंतु उनके ख्वाब बहुत बड़े थे वे चाहते थे कि उनके बच्चे डॉक्टर इंजीनियर आईएएस ऑफिसर बने पर निशांत की पढ़ाई की प्रोग्रेस देखकर वर्मा जी ने बहुत पहले ही निशांत से कोई उम्मीद करना छोड़ दिया था। निशांत ने भी अपने बाबूजी को कभी गलत साबित करना उचित नहीं समझा और बन गया वह मास्टर प्राइवेट स्कूल में । हम भारतीयों को शादी कराने की बहुत जल्दी होती है नौकरी लगी नहीं कि शादी की बातें शुरू। अब भई मध्यमवर्गीय परिवार का लड़का और वह भी स्कूल में मास्टर अच्छी लड़की मिले तो मिले कैसे। घर वाले बड़े परेशान क्या किया जाए पंडितों को बुलाया गया सलाह मशवरा किया गया किसी ने कहा निशांत बाबू की राशि में अभी शनि साढ़ेसाती है किसी ने विभिन्न प्रकार के दान बताएं ।इसी बीच निशांत जी के किसी दोस्त ने उन्हें सरकारी बैंक की पोस्टों के बारे में बताया उन्होंने सोचा शादी तो हो नहीं रही बैंक का फार्म ही भर देते हैं। फार्म भरा और निशांत बाबू की किस्मत चमक गई पहली ही बार में सिलेक्शन। ...

स्वप्ननिर्मित

दीवाली का काम और उसकी थकान आंख कब लग गई खबर नहीं नींद जब खुली तो देखा ये तो कोई और ही जगह है अपना घर नहीं। एक छोटा सा घर था  कच्चा आंगन बीच में कुआं था हां बैठक ज़रूर पक्की थी घर में चूल्हा नहीं गैस रखी थी निकली बाहर तो बदला सा नज़ारा था सारा का सारा शहर ही निराला था ऊंची इमारतें नहीं छोटे छोटे घरों का बोल बाला था हॉस्पिटल और स्कूल लेकिन बढ़िया वाला था पार्क नहीं पेड़ो पर झूले लटके थे  मोबाइल से नहीं पकड़म पड़काई खेल रहे बच्चे थे रेडियो पर आकाशवाणी की सुनाई दे रही थी धुन टी वी पर वही दूरदर्शन की धूम पक्की सड़कें थी खेतो में लहरा रही सरसों थी सब्जी दूध सब असली था लोग एकदुसरे के घर आ जा रहे थे थालियों में दीवाली की मिठाई लिए एक दूजे को खिला रहे थे बच्चे स्कूटी नहीं साइकिल चला रहे थे शहर नया था  पर जाने क्यों लग रहा दिल के करीब था पूछा मैंने किसी से क्या नाम है इस जगह का बोला स्वप्ननिर्मित किया है नामकरण इसका तभी किसी ने आवाज़ लगाई और मैं सपने से हकीकत में अाई पाया सब कुछ पहले जै...