अंतिम विदाई
सुबह के 4 बजे थे मीना आज रोज़ से थोडा जल्दी उठ गई थी कारण आज पीने का पानी आना था। उसके मौहले में पीने वाला पानी हफ्ते में 3 दिन ही आता था। मीना जल्दी-जल्दी बाल्टी ले कर नल की तरफ बढ़ी। आज तो पहला नंबर मेरा ही होगा सोचती हुई जब नल पर पहुँची तो देखा उसके आगे 6 नंबर थे। "कमबख़्त जाने कितनी भोर से यहाँ आ जाते हैं, रात में सोते भी हैं या नहीं" मन ही मन बडबडाते हुए मीना ने बाल्टी रख अपना 7वाँ नंबर सुरक्षित कर गहरी सांस ली। पिछली बार मीना की आँख देर से खुली तो 25वाँ नंबर लगा था। उसका नंबर आते-आते पानी ही खत्म हो चला था। सिर्फ 3 बरतन पानी मिला था उस दिन और रमेश की बहू से झगड़ा हुआ वह अलग।
अभी पानी आने में 2 घंटे शेष थे। मीना ने घर आकर जल्दी-जल्दी खाना बनाया स्नान आदि किया। फिर 6 बजे घर के अन्य सदस्यों (पति और 2 बेटो) को उठाया "उठो पानी आ गया है।" पानी शब्द सुनते ही सब फौरन उठ खड़े हुए।पूरा परिवार पानी भरने के अभियान में जुट गया। किसी ने लाईन मे लग मोरचा संभाला कोई घर के खाली बरतन लेकर दौड़ा तो कोई पानी से भरे बरतनों को घर पर रख कर आया । सभी के सहयोग से आज मीना के घर अच्छी मात्रा में पानी था।
सुबह के 8 बज चुके थे और सभी नित्य दिनचर्या में लग गए थे। मीना दूसरो के घर में झाडू पोछा और बर्तन धोने का काम करती थी और उसका पति( वरुण) रिक्शा चलाता था। आज ना जाने क्यू मीना को गांव की बहुत याद आ रही थी। 6 साल हो गए गांव छोड़े हुए । शहर की चकाचौंध में गांव से आ तो गए पर गांव आज भी याद आता है। कितनी शांति थी वहां बड़ा सा घर बड़ी बड़ी छत और यहां 2 कमरे के घर में गुजरा करना पड़ रहा है। गांव में पानी की भी किलत ना थी घर पर ही कुआ था। शुद्ध खाने को मिलता था और लोग भी कितने सीधे थे। खैर शहर में बच्चे तो अच्छे स्कूल में पढ़ रहे हैं बस इसी बात की तसल्ली थी। अब तो मीना का एक ही सपना था बड़े बेटे को कलेक्टर और छोटे बेटे को बैंक अफसर बनाना। अगली साल बड़े बेटे को आईएएस की कोचिंग लगवानी थी इसके लिए अभी से वह पाई पाई जोड़ रही थी।
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मीना आज बहुत खुश थी दोनों पति पत्नी ने मिलकर 30 हजार रुपए जमा कर लिए थे बस अब 10 हजार और जोड़ने थे वो भी जुड़ ही जाएंगे । उसके बाद बेटे को शहर के नामी आईएएस कोचिंग सेंटर में दाखिला दिलवा देंगे। मीना मीठे सपनों में खोई हुई थी उसके सपनों को फोन की घंटी ने तोड़ा। फोन गांव से था। मीना सोच में पड़ गई देवर जी ( अरुण) ने सालो से कभी बात नहीं की आज ऐसा क्या हो गया जो फोन आया है। उसने फोन उठाया देवर जी गंभीर स्वर में बोले भाभी आप और भैया फौरन गांव आ जाओ बाबूजी का देहांत हो गया है। मीना को अपने ससुर की मृत्यु की खबर सुन कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि उनकी उम्र 95 की हो चुकी थी तो अब कभी ना कभी तो उनको मारना ही था पर लोक लाज के कारण वाणी में आश्चर्य भर उसने पूछा अरे कब कैसे? देवरजी बोले अभी 1 घंटे पहले ही शांत हुए आप लोग आ जाओ फिर बात करते हैं।
मीना ने अपने पति को खबर दी और बच्चो सहित वे फौरन घर से निकाल लिए । जो भी पहली ट्रेन मिली वे उसमे सवार हो कर सुबह 8 बजे तक घर पहुंचे।
घर के चबूतरे पर बाबूजी का शव रखा था आस पास देवरजी और कई गांव वाले बैठे थे। अरुण को देख वरुण उससे लिपट गया और दोनों भाई एक दूसरे से लिपट कर रोने लगे मानो कभी दोनों में कोई गिला शिकवा रहा ही ना हो। मीना अंदर जाने लगी घर कुछ बदला बदला नजर आ रहा था। बैठक का कमरा पक्का बन गया था । घर में एक स्नानघर भी बन गया था। खैर ये समय घर को निहारने का नहीं था तो मीना ने अपनी उत्सुकता को दबा कर अंदर के कमरे में प्रवेश किया जहां औरतें बैठी हुई थी जैसे ही वह अंदर गई उसकी चाची सास उससे लिपट ज़ोर ज़ोर से रोने लगी जैसे बाबूजी के जाने का सबसे ज़्यादा दुख उनको ही हो। मीना को दुख तो था परन्तु इतना भी नहीं की रोना आ जाए। पर फिर वही लोक लाज के कारण वह भी घुघंट डालकर रोने का नाटक करने लगी।
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शाम को अंतिम संस्कार कर के दोनों भाई साथ बैठे । दोनों के बीच बड़ी ही गंभीर वार्ता चल रही थी विषय था बाबूजी की तेरहवीं का खर्चा। रिश्तेदार और गांव वालो को मिला कर करीब 200 लोग हो रहे थे । मीना की देवरानी बोली इतने लोगो को क्यू बुलाना खास खास लोगो को बुला लो। देवर बोला गजब करती हो तुम अभी 2 महीने पहले बिरजू ने अपने बाबूजी की तेरहवीं पर अपने गांव के साथ साथ पड़ोस वाले गांव से भी लोगो को खाने। पर बुलाया था और हम अपने बाबूजी की तेरहवीं पर अपने गांव को ना बुलाए तो कितनी जग हंसाई होगी। बड़े भाई वरुण ने भी सहमति जतलाई सही है लोग क्या कहेंगे दो दो बेटे हैं फिर भी ढंग की तेरहवीं ना कर सके। तो यह तय हुआ कि तेरहवीं पर रिश्तेदारों के साथ सारे गांव को निमंत्रण दिया जवेगा। पास ही बैठी बुआ ने सुझाव दिया "भैया तेरहवीं तो ठीक है पर कहते है जब कोई मरे है तो गरुण पुराण का पाठ कराए से बाकी आत्मा को शांति मिले है।" ये सुन कर मीना और उसकी देवरानी का दिल धक से रह गया पहले ही तरवी का इतना खर्चा ऊपर से गरुण पुराण और पंडित का खर्चा। मन तो अरुण वरुण का भी नहीं था पर बुआ ने कहा है नहीं मानो तो बुआ का अपमान होगा तो दोनों ने अनमने ढ़ंग से गरुण पुराण के लिए भी हामी भर दी।
दोनों सुबह होते ही पंडित के पास पहुंचे गरुण पुराण के बारे में बात की पंडित ने दान कि लंबी सूची पकड़ा दी जिसमें चारपाई, छाता,वस्त्र,गौ वगरह वगरह का उल्लेख था। दान दक्षिणा मिला यही कुछ 12000 का खर्चा था। पंडित जी अपने पेट पर हाथ फेरते हुए बोले "ध्यान रहे बेटा सभी सामान उच्च कोटि का होना चाहिए जैसा दान तुम दोगे वैसा ही सामान तुम्हारे बाबूजी को ऊपर मिलेगा। यदि तुम चाहते हो उनकी आत्मा ऊपर जा कर भी आराम से रहे तो अच्छा दान देना।" दोनों भाई हामी भर वहां से कार्ड वाले के पास पहुंचे।
कार्ड वाले ने 1000 रुपए में कार्ड छपने का ऑर्डर लिया। वह बोला आप लोग शाम तक मैटर ले आना। में 2 दिन में आपको सारे कार्ड छाप कर दे दूंगा।
दोनों ने घर आकर रिश्तेदारों से सलाह मशवरा कर कार्ड का मैटर तैयार किया और खाने का मेनू भी तैयार किया। शाम को तय समय में पंडित जी आए और घर में गरुण पुराण का पाठ आरंभ हो गया । मोहल्ले में सबको खबर दी गई जिसको भी गरुण पुराण सुनना हो आ जावे।
पाठ से फुर्सत हो कार्ड वाले को मैटर भिजवाया गया। कई मेहमान अभी से उनके घर में रुके हुए थे उनके लिए सब्जी, आटा, दाल ,सोने के लिए बिस्तर वगरह का इंतेजाम किया गया।
अगले दिन हलवाई को मेनू दिया गया हलवाई ने 20000 का खर्चा गिनवाया। फिर टेंट वाले से बर्तन गद्दे, स्टैंडवाले पंखों आदि की बात की गई उसने भी 12000 का खर्चा गिनवाया। बाबूजी की स्मृति में सबको ग्लास बांटने का निर्णय किया गया। ग्लास पर बाबूजी का नाम अंकित करवाया गया स्वर्गीय श्री जमुनादास जी की स्मृति में। दोना- पत्तल डिस्पोजल ग्लास इत्यादि का इंतजाम किया गया।
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दोनों भाई आपस की रंजिशो को भूल कर पिताजी के अंतिम कार्य में जी जान से जुटे हुए थे। आखिरकार वह दिन भी आ गया तेरवा दिन। पूरा गांव खाने आया दूर दूर से रिश्तेदार आए । सबने दोनों भाईयो के इंतजाम की बहुत तारीफ की ।
दोनों भाई आपस की रंजिशो को भूल कर पिताजी के अंतिम कार्य में जी जान से जुटे हुए थे। आखिरकार वह दिन भी आ गया तेरवा दिन। पूरा गांव खाने आया दूर दूर से रिश्तेदार आए । सबने दोनों भाईयो के इंतजाम की बहुत तारीफ की ।
सबके जाने के बाद जब हिसाब किया गया तो कुछ 90000 का खर्च हो चुके थे । 30000 बाबूजी के पास जमा थे उस राशि को मिलाया गया उसके बाद दोनों के हिस्से में 30000 आए। मीना ने इतनी मेहनत से जो 30000 की धनराशि बेटे की पढ़ाई के लिए जमा की थी वह सब 13 दिन में खर्च हो गई।
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गांव से लौटते समय समय ट्रेन में मीना ने ढुखी मन से पति से कहा कितनी मुश्किल से एक एक करके बेटे की पढ़ाई के लिए पैसे जोड़े थे सब खर्च हो गए। पति बोला "अरे अब पिताजी का अंतिम कार्य था पैसा दोबारा जुड़ जाएगा पिताजी की आत्मा हमें आशीर्वाद दे रही होगी।" इस पर मीना चिढ़ कर बोली "माता पिता तो हमेशा अपनी संतान को आशीर्वाद ही देते है इसके लिए खाकर भूल जाने वाले समाज के लोगो को खिलाने पिलाने की जरूरत नहीं पड़ती।" इस बार वरुण चुप था मीना ने सच ही कहा था लोग क्या कहेंगे के चक्कर में हम कई बार कर्ज कर के भी झूटी शान बनाने में लगे रहते हैं।
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