स्वप्ननिर्मित
दीवाली का काम और उसकी थकान
आंख कब लग गई खबर नहीं
नींद जब खुली तो देखा
ये तो कोई और ही जगह है अपना घर नहीं।
एक छोटा सा घर था
कच्चा आंगन बीच में कुआं था
हां बैठक ज़रूर पक्की थी
घर में चूल्हा नहीं गैस रखी थी
निकली बाहर तो बदला सा नज़ारा था
सारा का सारा शहर ही निराला था
ऊंची इमारतें नहीं छोटे छोटे घरों का बोल बाला था
हॉस्पिटल और स्कूल लेकिन बढ़िया वाला था
पार्क नहीं पेड़ो पर झूले लटके थे
मोबाइल से नहीं पकड़म पड़काई खेल रहे बच्चे थे
रेडियो पर आकाशवाणी की सुनाई दे रही थी धुन
टी वी पर वही दूरदर्शन की धूम
पक्की सड़कें थी
खेतो में लहरा रही सरसों थी
सब्जी दूध सब असली था
लोग एकदुसरे के घर आ जा रहे थे
थालियों में दीवाली की मिठाई लिए एक दूजे को खिला रहे थे
बच्चे स्कूटी नहीं साइकिल चला रहे थे
शहर नया था
पर जाने क्यों लग रहा दिल के करीब था
पूछा मैंने किसी से क्या नाम है इस जगह का
बोला स्वप्ननिर्मित किया है नामकरण इसका
तभी किसी ने आवाज़ लगाई
और मैं सपने से हकीकत में अाई
पाया सब कुछ पहले जैसा ही था
कितना हसीन स्वप्न निर्मित वो सपना था।
- संचिता सक्सेना "दर्शिका"
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